Saturday, July 4, 2020

चलते है 'अध्यात्मके गांव' को!

नमस्कार!  मै हेमंत वसंत गोरे, मराठी भाषिक होकेभी हिंदीमे लिखता हूं ताकि जादा लोगोंतक मेरी बात पहुंचे और अंग्रेजीमे इसलिए नहीं क्योंकी एक तो मुझे वो आती नही और दुसरा वो बहुतही 'अवैज्ञानिक' भाषा है।
आषाढ पौर्णिमा याने व्यासपौर्णिमा या गुरूपौर्णिमा याने महान वैज्ञानिक कवीमुनी कृष्णद्वैपायन की जयंती। पहले उन्हें वंदन करते है।
अब आते है विषयमे। शिर्षकमें चलनेकी बात निश्चित है लेकिन हमे 'शरिरसे' कही जानेकी आवश्यकता नही है। मनसेही जाये तो पुष्कळ है|
अध्यात्म शब्द अधि+आत्मसे बना है| याने‌ आत्मा मे स्थित होना या असली 'स्व'मे स्थीत होना| अध्यात्मविज्ञान ही श्रेष्ठ विज्ञान है लेकीन उसके बारेमे बहुतसे अपसमज, अपमत फैलाये है| अध्यात्म और स्पिरीतुआलिटी एकही नहीं है, बल्कि भिन्न है|
कुछ कुबुद्धिवादी पूंछते है की अगर आत्मा है तो दिखता क्यूं नहीं, इसको सिद्ध कैसे करोंगे वगैरा-वगैरा! लेकिन आत्मा-परमात्मा है और हर दिन हम उसे अनुभूत  करते है| अगर आत्मा नहीं तो सजिव-निर्जिव ऐसा कोई फरकही नहीं है| सायन्सकेनुसार कुछभी उत्पन्न नहीं होता या नष्ट नहीं होता| तो फिर जन्म-मृत्यू तो आत्माका आना-जानाही है, बराबर ना!
अब आत्मा है तो बुद्धिमान प्राणी होनेके नाते हमारा अधिकार भी है और कर्तव्य भी है कीं हम उसे जान ले, समझ ले और बस उसको जानने-समझनेकी विधी है अध्यात्म और (मेरे मतसे)कुछ नहीं|
मुझे लगता है इतना काफी है| आभार, धन्यवाद!

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