Saturday, January 11, 2025

जन्णन: जायते क्षूद(शूद्र नहीं)!

मैंने ये बहुत बार कथा-किर्तन-प्रवचनकारोंसे सुना है कि जन्मन: जायते शूद्र! परंतु अब मुझे लगता है वो क्षूद्र ही कहते होंगे क्योंकि जन्म से कोई शूद्र(सेवक) भी नहीं हो सकता।
सनातन धर्म में मूलतः तीन ही वर्ण थे। वो है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। बाद में जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता था, उन्हें शूद्र कहने जाने लगा। परंतु वो भी अछूत नहीं थे। वो तीनों वर्णों के घर में ही रहते थे और तीनों वर्णो की सेवा करने थे। इसलिए उनके बुढ़ापे में उनको संभालने का दायित्व जीन के वो सेवक थे उनका होता था! ये धर्मशास्त्र मे ही लिखा है।

Tuesday, January 7, 2025

एक स्त्रीा के कारण नहीं हुए रामायण, महाभारत!

यह बहुत ही गलत प्रचार किया जाता है कि रामायण/महाभारत एक स्त्री के कारण हुआ। लेकिन ये बिल्कुल झूठ है. रामायण हो या महाभारत, न तो स्त्री के कारण हुआ और न ही स्त्री के लिए। हाँ! कुछ स्त्रीये भी इन घटनाकी कारण हुईं। लेकिन तब इंसानों की अक्ल(?) सूअरों का मल खाने में चली गई थी!
 कैकेयी ही थी रामायण की सूत्रधार! परन्तु यदि तीनों ने राम को वनवास न भेजा होता तो रावण = शूर्पणखा जैसा बलात्कारी, चांगल = भयानक राक्षस = राक्षसों का विनाश न होता। 'धर्म', संस्कृति की पुनः स्थापना न होती। विभीषण को न लंका का राज्य मिलता और न 'रामराज्य' आता।
 यदि कोई स्त्री है जिसने महाभारत के निर्माण में किसी तरह योगदान दिया, तो वह द्रौपदी नहीं, बल्कि गांधारी है! तीनों ने आंखों पर पट्टी बांधकर अपने पति(?)-बच्चों की करतूतों को नजरअंदाज कर दिया। और यदि देवव्रत भीष्म गलत धार्मिक विचारों पर अड़े नहीं रहते तो शायद महाभारत का युद्ध टाला जा सकता था।
 मुझे लगता है कि इस बारे में इतना ही काफी है। अभी यहीं रुकें. ध्यान देने वालों को धन्यवाद, धन्यवाद!

Monday, January 6, 2025

युधिष्ठिर, देवव्रत: आद्य 'गांधीवादी'!

(शीर्ष टिप्पणी: मैं मेरे 'कमजोर ऋदयवाले भोले(मूर्ख) सनातनि(सभी नहीं) मित्रों से निवेदन करता हूं कि वो इस प्रेषण को आगे न पड़े।)
कुछ जनों के ये प्रश्न गिर सकता है कि ये युधिष्ठिर या देवव्रत कौन है! तो मैं पहले ही ये बता देता हूं। महाभारत में जिन्हें धर्म(राज) और भीष्म पितामह इस विशेषण से जाना जाता है वो अनु. युधिष्ठिर और देवव्रत है।
बहुतांश जन युधिष्ठिर और देवव्रत को धर्म के 'आचार्य' मानते है और 'कुछ सीमा तक' वो 'सत्य' भी है। परंतु सब से बड़ा अधर्म ये है कि अपने पत्नी या अर्धांगिनी या सहधर्मिणी को दांव पर लगाना या कोई लगा रहा है तो उसे जानते हुए भी न रोकना। ये सच है कि धृतराष्ट्र, कर्ण और शकुनि बहुत हरामी थे। परंतु जुआ(द्यूत) खेलना कौनसा बड़ा धर्म है! युधिष्ठिर कि इसलिए स्तुति कि जाती है कि यक्ष को उसने अपने सौतेले भाई को जिंदा करते को कहा! परंतु हम भूल जाते है कि हमें लडना हो तो राष्ट्रधर्म के लिए लडना चाहिए, न कि अपने व्यक्तिगत धारणा के लिए। युधिष्ठिर को अपने लिए नहीं परंतु राष्ट्र के लिए अर्जुन को जिवीत करने को कहना चाहिए था(वैसे देखा जाए तो अर्जुन भी सौतेला भाई ही था)!
मुझे लगता है इतना पुरेसा है। शीर्ष टीप देने के बाद भी पढके किसी के भावनाओं ठेच पहुची है तो पुरे मनसे क्षमायाचना! जय सनातन!

Sunday, January 5, 2025

स्त्री: नर्क का द्वार या स्वर्गसुख(आनंद) का भडार?


कुछ कथाकार(?), तथाकथित धर्मग्रंथ बताते है कि स्त्री नर्क का द्वार है। कई मराठी संतों ने भी इस आशय का लेखन अपने ग्रंथों में किया है(हांलांकि उनका उद्देश्य हम जैसे मनुष्य को विषय भोगों में अतिलिप्त होने से बचाया था)। तो हम थोड़ी चर्चा करते है कि क्या स्त्रीया सचमुच में नर्क का द्वार होती है क्या!
हमारे सनातन धर्म में मां कि न केवल महिमा गाई है बल्कि उसे भगवान और परमात्मा का रुप बताया है। तो मां भी तो एक स्त्री होती है। क्या उसे हम नर्क का द्वार कहेंगे! हम बाहर से कितनी भी निंदा करें, परंतु अंदर से तो यौन सुख का आनंद बहुतांश जन चाहते है(कुछ गिने चुने अपवाद हो सकते हैं)। स्वस्थ समाज के लिए सबको वो मिलता या उस सुख की संतुष्टि होना मेरे विचार से तो आवश्यक है। और उसके सिवा जीवन चक्र चल सकना भी बहुत कठीण है(हर कोई क्लोनिंग नहीं कर सकता)। तो मेरे विचार से स्त्री नर्क का द्वार नहीं स्वर्गसुख का भंडार है।