मैंने ये बहुत बार कथा-किर्तन-प्रवचनकारोंसे सुना है कि जन्मन: जायते शूद्र! परंतु अब मुझे लगता है वो क्षूद्र ही कहते होंगे क्योंकि जन्म से कोई शूद्र(सेवक) भी नहीं हो सकता।
सनातन धर्म में मूलतः तीन ही वर्ण थे। वो है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। बाद में जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता था, उन्हें शूद्र कहने जाने लगा। परंतु वो भी अछूत नहीं थे। वो तीनों वर्णों के घर में ही रहते थे और तीनों वर्णो की सेवा करने थे। इसलिए उनके बुढ़ापे में उनको संभालने का दायित्व जीन के वो सेवक थे उनका होता था! ये धर्मशास्त्र मे ही लिखा है।