(शीर्ष टिप्पणी: मैं मेरे 'कमजोर ऋदयवाले भोले(मूर्ख) सनातनि(सभी नहीं) मित्रों से निवेदन करता हूं कि वो इस प्रेषण को आगे न पड़े।)
कुछ जनों के ये प्रश्न गिर सकता है कि ये युधिष्ठिर या देवव्रत कौन है! तो मैं पहले ही ये बता देता हूं। महाभारत में जिन्हें धर्म(राज) और भीष्म पितामह इस विशेषण से जाना जाता है वो अनु. युधिष्ठिर और देवव्रत है।
बहुतांश जन युधिष्ठिर और देवव्रत को धर्म के 'आचार्य' मानते है और 'कुछ सीमा तक' वो 'सत्य' भी है। परंतु सब से बड़ा अधर्म ये है कि अपने पत्नी या अर्धांगिनी या सहधर्मिणी को दांव पर लगाना या कोई लगा रहा है तो उसे जानते हुए भी न रोकना। ये सच है कि धृतराष्ट्र, कर्ण और शकुनि बहुत हरामी थे। परंतु जुआ(द्यूत) खेलना कौनसा बड़ा धर्म है! युधिष्ठिर कि इसलिए स्तुति कि जाती है कि यक्ष को उसने अपने सौतेले भाई को जिंदा करते को कहा! परंतु हम भूल जाते है कि हमें लडना हो तो राष्ट्रधर्म के लिए लडना चाहिए, न कि अपने व्यक्तिगत धारणा के लिए। युधिष्ठिर को अपने लिए नहीं परंतु राष्ट्र के लिए अर्जुन को जिवीत करने को कहना चाहिए था(वैसे देखा जाए तो अर्जुन भी सौतेला भाई ही था)!
मुझे लगता है इतना पुरेसा है। शीर्ष टीप देने के बाद भी पढके किसी के भावनाओं ठेच पहुची है तो पुरे मनसे क्षमायाचना! जय सनातन!
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