मेरे मां को प्रवचन सुनने में बहुत आनंद आता है (मुझे भी आता है)। वो वक्ता कुछ ख़ास ना हो तो भी प्रवक्ता सुनतीं रहतीं हैं। इन प्रवचन कारों में कुछ 'लोग सच में बहुत अच्छा प्रवक्ता करते हैं लेकिन कुछ भगवान कैसा अच्छा है और संसार कैसा झूठा है यही बताते रहते हैं। उन्होंने रटाया बहुत होता है लेकिन 'सच्चे ज्ञान' की कमी होती है। सिर्फ भगवान सच्चा और जग झूठा ये 'महान हिंदू वैज्ञानिक' आदि शंकराचार्य के ब्रह्म सत्यं सत्यं,जगं मिथ्या 'सिद्धांत" का विपर्यास है। मिथ्या का अर्थ झूठ(ठा) नहीं है। मिथ्या का अर्थ है जो सदा के लिए एक जैसा रहता नहीं है। अंग्रेजी में एक कहावत है की फोर्म इस टेम्पोररी, क्लास इस पर्मनंट। मानें रुप तात्पुरता है, दर्जा शाश्वत है। वैसे जग का रुप बदलता है। ब्रम्ह हीं असली स्वरूप है। इसलिए 'महान हिंदू वैज्ञानिक' शंकराचार्य ने कहा है ब्रम्ह सत्यं, जगं मिथ्या।
Friday, February 4, 2022
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