आज हम(राष्ट्रप्रेमी हिंदू) चिनीओको या 'पापि'योंको हमारे शत्रू मान रहे है लेकीन वो तो स्थूल रुपसे हमारे शत्रू है| असलमे हमारे(मानवताके) प्रमुख शत्रू लोभ और मोहही है|
मुझे पुरी खात्री है की ये दो वाक्य पढके छोटी सोचवाले मूर्खताभक्त मुझे चीन और पापियोंका हितैषी कहेंगे(मै इन्कार नहीं करता हूं लेकीन...) लेकिन यही सच है की हमारे असली शत्रू लोभ और मोहही है| पुरातन कालमें हिंदूओंको जादातर बच्चो और बिबियोंका लोभ और मोह(और कुछ हदतक एक पीले धातुविशेषका) था लेकिन आजके हिंदूओंको घरोंका, मेहेंगे गाडीयोंका, उपकरणोंका मोह और लोभ है| हममे शारीरिक श्रमके प्रति आलसभी है| इसके कारण हमारी(हिंदूओंकी) संतांना शारिरीक और मानसिक और सदसद्विवेकबुद्धीमें कमजोर हो रही है| इसिका लाभ चिनी और 'पापी' उठा रहै है| अगर सिर्फ 'आवश्यकताए'ही हमारी 'प्राथमिकता' बनेगी, हम 'अनावश्यक' वस्तूहोंका संग्रह करना छोड देंगे, हमारी पुरानी 'सभ्यता'के और मुडेंगे तो हम अवश्य इन 'पापी'-चिनीआओंका मुकाबला कर सकते हैं|
पुरा पढनेवालोंको धन्यवाद! वो कृपया #MwithUHemant टिप्पणी करे|
जय 'भारत', जय जगत!
#HindiChiniByeBye!
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Wednesday, June 17, 2020
लोभ और मोह: इन्सानियत या मानवताके असली शत्रू
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