आज नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश(?) ‘तरक्की’ कर रहा है इस में मुझे कोई शंका नहीं है परंतु हय इस तरक्की के लालच में विनाश की ओर जां रहे हैं इसमें भी मुझे कणमात्र भी शंका नहीं है। हमें और बड़ा बंगला चाहिएं, और बड़ी गाडियां चाहिए तो रास्ते भी बड़े लगेंगे यह समझने के कोई कृष्णद्वैपायन होने की आवश्यकता नहीं है। हम अब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय तो क्या! क्षूद्र भी नहीं अहंकारी असूर बन रहें हैं। हम आज ‘सांख्यशास्त्र* के ‘भ्रष्ट युरोपिय उपभोग’ को विज्ञान समझते हैं। निश्चित ही हम प्रति दिन विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।
अब कुछ जन कहेंगे कि क्या तुम इन गोष्टियोंका उपयोग नहीं करते! क्या तुम जो मोबाइल/स्मार्टफोन (भ्रमणभाष/चतुरभाष संच) का उपभोग करने है वो गलत नहीं है। तो वो भी गलत है। परंतु आज के समय की ये अपरिहार्यता है। और मै किसी को भी इन वस्तुओं का उपयोग करना ही बंद करे ऐसा नहीं कहता हूं। मेरा केवल इतना ही कहना है इन वस्तुओं का उपयोग कर के अपने आप को सबसे बुद्धिमान न समझे। प्रकृति हमारी मां है, भोगो के लिए उस पर हो रहे ‘बलात्कार’ बंद करे। ‘सभी’ पशू-पक्षियों के प्रति अपनी संतान जैसी संवेदना रखे।
जय सिंध, जय ‘महा’राष्ट्र!
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