Tuesday, January 7, 2025

एक स्त्रीा के कारण नहीं हुए रामायण, महाभारत!

यह बहुत ही गलत प्रचार किया जाता है कि रामायण/महाभारत एक स्त्री के कारण हुआ। लेकिन ये बिल्कुल झूठ है. रामायण हो या महाभारत, न तो स्त्री के कारण हुआ और न ही स्त्री के लिए। हाँ! कुछ स्त्रीये भी इन घटनाकी कारण हुईं। लेकिन तब इंसानों की अक्ल(?) सूअरों का मल खाने में चली गई थी!
 कैकेयी ही थी रामायण की सूत्रधार! परन्तु यदि तीनों ने राम को वनवास न भेजा होता तो रावण = शूर्पणखा जैसा बलात्कारी, चांगल = भयानक राक्षस = राक्षसों का विनाश न होता। 'धर्म', संस्कृति की पुनः स्थापना न होती। विभीषण को न लंका का राज्य मिलता और न 'रामराज्य' आता।
 यदि कोई स्त्री है जिसने महाभारत के निर्माण में किसी तरह योगदान दिया, तो वह द्रौपदी नहीं, बल्कि गांधारी है! तीनों ने आंखों पर पट्टी बांधकर अपने पति(?)-बच्चों की करतूतों को नजरअंदाज कर दिया। और यदि देवव्रत भीष्म गलत धार्मिक विचारों पर अड़े नहीं रहते तो शायद महाभारत का युद्ध टाला जा सकता था।
 मुझे लगता है कि इस बारे में इतना ही काफी है। अभी यहीं रुकें. ध्यान देने वालों को धन्यवाद, धन्यवाद!

Monday, January 6, 2025

युधिष्ठिर, देवव्रत: आद्य 'गांधीवादी'!

(शीर्ष टिप्पणी: मैं मेरे 'कमजोर ऋदयवाले भोले(मूर्ख) सनातनि(सभी नहीं) मित्रों से निवेदन करता हूं कि वो इस प्रेषण को आगे न पड़े।)
कुछ जनों के ये प्रश्न गिर सकता है कि ये युधिष्ठिर या देवव्रत कौन है! तो मैं पहले ही ये बता देता हूं। महाभारत में जिन्हें धर्म(राज) और भीष्म पितामह इस विशेषण से जाना जाता है वो अनु. युधिष्ठिर और देवव्रत है।
बहुतांश जन युधिष्ठिर और देवव्रत को धर्म के 'आचार्य' मानते है और 'कुछ सीमा तक' वो 'सत्य' भी है। परंतु सब से बड़ा अधर्म ये है कि अपने पत्नी या अर्धांगिनी या सहधर्मिणी को दांव पर लगाना या कोई लगा रहा है तो उसे जानते हुए भी न रोकना। ये सच है कि धृतराष्ट्र, कर्ण और शकुनि बहुत हरामी थे। परंतु जुआ(द्यूत) खेलना कौनसा बड़ा धर्म है! युधिष्ठिर कि इसलिए स्तुति कि जाती है कि यक्ष को उसने अपने सौतेले भाई को जिंदा करते को कहा! परंतु हम भूल जाते है कि हमें लडना हो तो राष्ट्रधर्म के लिए लडना चाहिए, न कि अपने व्यक्तिगत धारणा के लिए। युधिष्ठिर को अपने लिए नहीं परंतु राष्ट्र के लिए अर्जुन को जिवीत करने को कहना चाहिए था(वैसे देखा जाए तो अर्जुन भी सौतेला भाई ही था)!
मुझे लगता है इतना पुरेसा है। शीर्ष टीप देने के बाद भी पढके किसी के भावनाओं ठेच पहुची है तो पुरे मनसे क्षमायाचना! जय सनातन!

Sunday, January 5, 2025

स्त्री: नर्क का द्वार या स्वर्गसुख(आनंद) का भडार?


कुछ कथाकार(?), तथाकथित धर्मग्रंथ बताते है कि स्त्री नर्क का द्वार है। कई मराठी संतों ने भी इस आशय का लेखन अपने ग्रंथों में किया है(हांलांकि उनका उद्देश्य हम जैसे मनुष्य को विषय भोगों में अतिलिप्त होने से बचाया था)। तो हम थोड़ी चर्चा करते है कि क्या स्त्रीया सचमुच में नर्क का द्वार होती है क्या!
हमारे सनातन धर्म में मां कि न केवल महिमा गाई है बल्कि उसे भगवान और परमात्मा का रुप बताया है। तो मां भी तो एक स्त्री होती है। क्या उसे हम नर्क का द्वार कहेंगे! हम बाहर से कितनी भी निंदा करें, परंतु अंदर से तो यौन सुख का आनंद बहुतांश जन चाहते है(कुछ गिने चुने अपवाद हो सकते हैं)। स्वस्थ समाज के लिए सबको वो मिलता या उस सुख की संतुष्टि होना मेरे विचार से तो आवश्यक है। और उसके सिवा जीवन चक्र चल सकना भी बहुत कठीण है(हर कोई क्लोनिंग नहीं कर सकता)। तो मेरे विचार से स्त्री नर्क का द्वार नहीं स्वर्गसुख का भंडार है।

Tuesday, November 19, 2024

शिकलेली आई, संकटात नेई!


गेल्या काही वर्षांत मुलींचं शिक्षणा(?)चं प्रमाण वाढलं ही 'तशी बरी' गोष्ट आहे. अनेक जणी घराबाहेर 'पडून' पैसे कमावतात, नवऱ्याला प्रपंचात 'आर्थिक' सहाय्य करतात ह काही वाईट नाही. पण वाईट हे आहे की या तथाकथित शिकलेल्या बायका समाज माध्यमात वाचून/पाहून आपलं मत बनवितात आणि त्यांच्या मते अशिक्षित सासू-सासरे(आणि आईवडील देखील) यांनी सांगितलेलं सगळंच चुकीचं समजतात.त्यांच्या 'अपूर्व' ज्ञानापुढे त्यांना आईवडिलांचं, सासू-सासऱ्यांचं 'अनुभवसिद्ध' पारंपरिक ज्ञान फिकं वाटतं. आणि इथच आपल्या अपत्याचं भविष्य उज्ज्वल बनवायचं म्हणून संकटात नेतात.

Monday, September 9, 2024

स्त्रीत्व: वरदान या छाप!

ये सच है की ही स्त्रीही मां बन सकती है। परंतु क्या मां बनना वरदान है। मुझे लगता है, नहीं! कितने कष्ट होते है मां बनने में! हम नरों का क्या जाता है मां की महती गांने में! सहनातो स्त्रीयों को ही है। कुछ हरामियों को छायद ये भी कम लगा इसलिए उन्होंने 'पतिव्रता धर्म'के नाम पर स्त्रीयों को झूठा महिमा मंडित करके दबाके रखनेवाला 'झूठा' पातिव्रत धर्म सनातन धर्म में घुसाया। और नराधमों को मुक्त छोड दिया।
'सच्चा पातिव्रत धर्म'
पातिव्रत धर्म का अर्थ आमतौर पर अपने पति(?) के सिवा किसी से संभोग या मैथुन नहीं करना ऐसा समझा जाता है। परंतु ये अर्थ सिमित है। मेरे लिए 'सच्पी' पतिव्रता वही जो किसी 'सत्पुरुष' से विवाह करके उसके सभी अच्छे कार्य में उसके साथ रहती है। हां, अगर दुर्भाग्यवश रावण जैसे किसी नराधम से विवाह(?) हो और उससे निष्ठा रखना भी पातिव्रत्य है। परंतु राष्ट्र के लिए कैकयी, सत्यभामा, राणी लक्ष्मीबाई और सावरकर बंधुओं के स्त्रीयों जैसी पतिव्रताए चाहिए।

शौच क्या है!

हम पढ़ते लिखने वाले मूर्खोने कई मूल संस्कृत शब्दों को विपरीत अर्थ दिया है। उनमें एक है शौच! आज ज्यादातर जनों का समज है कि शौच याने गूं! परंतु वैसा बिल्कुल नहीं है। उल्टा शौच का अर्थ हैं पवित्रता! इसलिए मृत्यु या जन्म के उपरांत दस दिन 'अशौच' होता है।

Thursday, August 22, 2024

सापेक्षता आणि अद्वैत

आईनस्टाईननं सापेक्षतावाद मांडला. पण त्यापूर्वी(?) कित्येक वर्षे आद्य(?) शंकराचार्यांनी अद्वैताचा सिद्धांत मांडला. हे दोन्ही आपल्याला 'पदोपदी' जाणवतात पण आपल्या लक्षात येत नाही(तसंही 'जीवनात' यांचा फार काही 'उपयोग' होत नाही)
आता सापेक्षतावाद म्हणजे काय! तर विश्व हे सापेक्ष आहे.समजा आपण 'निर्व्याध' आहोत. मग आंबा हे आपल्यासाठी अन्न आहे. तो आंबा खाल्ला की त्याचा काही भाग पचून शरिरात मिसळतो. तर काही भाग गू म्हणून टाकला जातो. आता जर तो आपण 'डुकरांच्या' पुढ्यात टाकला तर ते त्यांचं अन्न होतं. तेच खड्यात पुरला तरी सूक्ष्म अशा जीवाणूंचा अन्न होतं. पण आपल्या करिता मात्र तोपर्यंत ते गूच असतं. म्हणजे काय सापेक्ष असतं.
दुसरं उदाहरण! मी हे टंकित करत आहे तीथं आता पहाट होत आहे. पण अमेरिकेत आता रात्र/सायंकाळ होतं असणार. म्हणजे हेही सापेक्ष आहे. थोडक्यात काय तर विश्वातील प्रत्येक गोष्ट सापेक्ष आहे.
अद्वैत म्हणजे काय तर ब्रह्म सत्य आणि जग मिथ्या. अनेक मूर्ख तथाकथित (भागवत)कथाकार मिथ्या म्हणजे अस्तित्वातच नसलेल्या गोष्टी असं समजतात. पण मिथ्या म्हणजे सत्य(शाश्वत) नसलेलं! 'अ'सत्य नव्हे. हे समजण्यासाठी 'मूळ' शंकराचार्यांचीच प्रज्ञा हवी. नुसती 'पोपटपंची' करून उपयोग नाही.
एवढं वाचल्यानंतर तुम्हा सुज्ञांच्या लक्षात आलंच असेल की सापेक्षतावाद आणि शंकराचार्यांचा अद्वैत सिद्धांत या एकाच  नाण्याच्या दोन बाजू आहेत.