Friday, August 16, 2024

मनोरंजन और संस्कृति!

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती किं गायन, वादन, नृत्य और अभिनय ये सनातन भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग है परंतु इनके नाम पे आज जो चलचित्र वाहिनियों द्वारा जो परोसा जा रहा है वो केवल संस्कृति ही नहीं अपितु समाज के 'स्वास्थ्य' के लिए भी हानिकारक है। मनोरंजन के नाम पे आज जो समाज में जहर घोला जा रहा हैं वो अत्यंत भयानक है। द्यूत(जुआ), सुरा(शराब), व्यभिचार और मांसाहार का जोर=शोर से प्रचार हो रहा हैं। और इसमें एक बहुत बड़ी विडंबना ये भी है कि जो कल तक भारतीय सभ्यता-संस्कृति के पालक थे उनके ही वंशज इसका बड़ा हिस्सा बन रहें है। बिग बॉस जैसे प्रदर्शन समाज को सिखा देते हैं कि सत्ता(?) हथियाने के लिए कुछ भी करो, अपराध नहीं है। अगर इसे रोका नहीं गया तो आने वाले समय में ये भारतीय सभ्यता-संस्कृति के साथ साथ पुरे 'हिंदू' समाज को भी ध्वस्त कर देगा।
जो जीता(सच के साथ) वही विजेता!
कुछ साल पहले आमिर अभिनीत एक हिंदी फिल्म आई थी, जो जीता वही सिकंदर! कई लोगों के मन में ये सवाल हो सकता है कि अब इस फिल्म का क्या होगा! कई लोग कहेंगे कि इसमें क्या ग़लत था! वे ये भी कहेंगे कि यह कट्टरता है! लेकिन मस्तिष्क-धुलाई धीरे-धीरे की जाती है। यह फिल्म सिखाती है कि कुछ भी करो लेकिन जीतो (और दुश्मन को नष्ट करो)! इससे अपंथीयो के रुख का पता चलता है. और अगर ठीक से अध्ययन किया जाए तो यह ध्यान में आएगा कि विजता एक 'शुद्ध भारतीय' शब्द होने के बावजूद भी सिकंदर का उपयोग फ़ारसी/अरबी मूल के साथ किया जाता है क्योंकि सभ्य(?) डाकू चाहते हैं कि हम उनके दास (गुलाम) बनें। लेकिन इसके बारे में सोचो!
ध्यानपूर्वक पढ़ने और इसमें कुछ करने वालों को धन्यवाद। 
जय सिंध, जय भारत, जय 'महा'राष्ट्र और विश्व!

Tuesday, June 18, 2024

आयुर्वेद: सुदृढ, निरोगी जीवन जगण्याची ‘एकमेव कला’!

(महत्वाची शीर्षटीप: मी आडनावाचा देखील वैद्य नाही. जे वाचलं(आणि मुख्य म्हणजे अनुभवलं) त्या आधारे लिहीत आहे.)

पुष्कळ जनांना वाटतं आयुर्वेद ही एक चिकित्सा पद्धती आहे ज्यात केवळ वनस्पतीचे भाग वापरले जातात. पण तसे काही नाही. आयुर्वेदात बारा क्षार औषधी ही आहेतत, शस्त्रक्रियाही आहे. मुळात आयुर्वेद केवळ चिकित्सापद्धती नसून जीवन कसं जगावं याचं ‘शास्त्र’ आहे.

थोडं फार आयुर्वेदाविषयी जाणणारे कधी कधी म्हणतात की आयुर्वेदात कफ, वात पित्त यापलीकडे आहे काय! पण त्यांना हे माहित नसतं की आपण(ते) समजतो तेवढं क्षूद्र नाही आहे हे! आयुर्वेदात कफ, वात, पित्त आणि पंच महाभूते यांना ‘विश्वव्यापक’ अर्थ आहे. कफ, वातं, पित्त यांना त्रिदोष जरी म्हटलं तरी शरिराचा ते ‘अविभाज्य’ भाग आहेत. आपलं सगळं जीवनच नाही तर ‘वंशसातत्यही’ त्यांच्या प्रमाणावर अवलंबून आहे.  तेव्हा आयुर्वेदाला ‘केवळ झाड‌पाल्याची औषधं’ नका समजू, आयुर्वेद ‘सुदृढ, निरोगी’ जीवन जगण्याची 'एकमेव' कला आहे.

Tuesday, March 12, 2024

चलिए एक कदम विनाश की ओर!

आज नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश(?) ‘तरक्की’ कर रहा है इस में मुझे कोई शंका नहीं है परंतु हय इस तरक्की के लालच में विनाश की ओर जां रहे हैं इसमें भी मुझे कणमात्र भी शंका नहीं है। हमें और बड़ा बंगला चाहिएं, और बड़ी गाडियां चाहिए तो रास्ते भी बड़े लगेंगे यह समझने के कोई कृष्णद्वैपायन होने की आवश्यकता नहीं है। हम अब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय तो क्या! क्षूद्र भी नहीं अहंकारी असूर बन रहें हैं। हम आज ‘सांख्यशास्त्र* के ‘भ्रष्ट युरोपिय उपभोग’ को विज्ञान समझते हैं। निश्चित ही हम प्रति दिन विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।

अब कुछ जन कहेंगे कि क्या तुम इन गोष्टियोंका उपयोग नहीं करते! क्या तुम जो मोबाइल/स्मार्टफोन (भ्रमणभाष/चतुरभाष संच) का उपभोग करने है वो गलत नहीं है। तो वो भी गलत है। परंतु आज के समय की ये अपरिहार्यता है। और मै किसी को भी इन वस्तुओं का उपयोग करना ही बंद करे ऐसा नहीं कहता हूं। मेरा केवल इतना ही कहना है इन वस्तुओं का उपयोग कर के अपने आप को सबसे बुद्धिमान न समझे। प्रकृति हमारी मां है, भोगो के लिए उस पर हो रहे ‘बलात्कार’ बंद करे। ‘सभी’ पशू-पक्षियों के प्रति अपनी संतान जैसी संवेदना रखे।

जय सिंध, जय ‘महा’राष्ट्र!


Saturday, March 2, 2024

‘विषारी’ विवाह!

खरं तर विवाह संस्कार विधींची निर्मिती द्रष्ट्या ऋषीमुनींनी मानवांच्या नैसर्गिक भावनेला ‘योग्य’ वाट मिळावी, पुढील पिढी, समाज सुदृढ, सुसंस्कारित व्हावीत म्हणून केली. पण आजच्या काळात हौसमौज या नावाखाली जे काही विवाह समारंभात चालतं ते पाहून त्यांना पश्चात्ताप होत असेल.
माझ्या लहानपणी बहुतांश विवाह कुणाच्या तरी घरात किंवा शाळेत वगैरे होत. कार्यालयं वगैरे कमी होती. हळद चढविण्याव्यतिरिकक्त शृंगार केला जात नव्हता. छायाचित्रण, चलचित्रणही फारसं केलं जात नसे. त्यामुळे विधींना पुरेसा वेळ देऊनही विवाह समारंभ लवकर आटपायचा. 
आता विवाह एकदाच होतो या सबबीखाली जे काही होतं त्यावर खरं तर चारचौघात बोलायची सोय नाही(म्हणून मला समाज माध्यमांचा आधार घ्यावा लागत आहे).
शृंगार करुच नये असं माझं मत नाही. पण अलीकडे ब्रायडल मेकअप अशा काही नावांचा(मला इंग्रजीचा गंधही नाही.) भयानक प्रकार केला जातो तो पहावत नाही. त्यात कसली-कसली घाण रसायनं वापरतात ‘निर्मातेच’ जाणतात. मुखं इतकी विचित्र दिसतात की चलचित्र मालिकेतील राक्षसी देखील बऱ्या दिसतात. 
हे झालं मेकअप नावाच्या प्रकाराबद्दल! छायाचित्रणाबद्दल काय बोलणार! लहान-लहान कार्टी देखील भ्रमणभाष/चतुरभाष संच घेऊन छायाचित्रण/चलचित्रण करण्यासाठी धावत असतात. तिथं विधी, लग्न लावणारे गुरुजी दुय्यम ठरतात. हे सगळं बघितलं की वाटतं विवाह(?) हे भारतीय संस्कृती, येणारी पिढी(आणि वधू-वरांसाठीही) विषारी बनत आहेत.

Friday, February 4, 2022

ब्रम्ह सत्यं जगं मिथ्या!

मेरे मां को प्रवचन सुनने में बहुत आनंद आता है (मुझे भी आता है)। वो वक्ता कुछ ख़ास ना हो तो भी प्रवक्ता सुनतीं रहतीं हैं। इन प्रवचन कारों में कुछ 'लोग सच में बहुत अच्छा प्रवक्ता करते हैं लेकिन कुछ भगवान कैसा अच्छा है और संसार कैसा झूठा है यही बताते रहते हैं। उन्होंने रटाया बहुत होता है लेकिन 'सच्चे ज्ञान' की कमी होती है। सिर्फ भगवान सच्चा और जग झूठा ये 'महान हिंदू वैज्ञानिक' आदि शंकराचार्य के ब्रह्म सत्यं सत्यं,जगं मिथ्या 'सिद्धांत" का विपर्यास है। मिथ्या का अर्थ झूठ(ठा) नहीं है। मिथ्या का अर्थ है जो सदा के लिए एक जैसा रहता नहीं है। अंग्रेजी में एक कहावत है की फोर्म इस टेम्पोररी, क्लास इस पर्मनंट। मानें रुप तात्पुरता है, दर्जा शाश्वत है। वैसे जग का रुप बदलता है। ब्रम्ह हीं असली स्वरूप है। इसलिए 'महान हिंदू वैज्ञानिक' शंकराचार्य ने कहा है ब्रम्ह सत्यं, जगं मिथ्या।

Monday, August 30, 2021

श्रीकृष्ण कौन थे!

अक्सर श्रीकृष्ण को माखनचोर, गोपियों को छेड़ने वाला, राधा से व्यभिचार करनेवाला बताया जाता है लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं है। ये सब भागवतादी पुराणों की देन है जिनमें तथ्य तो है, लेकिन 'सत्य' नहीं है।
श्रीकृष्ण एक आदर्श चरित्र है। एक आदर्श बंधू, एक आदर्श पती(पती का मतलब जो केवल हवस के लिए पत्नी को चोदने वाला नहीं है), एक आदर्श पीता, एक आदर्श राजा और एक आदर्श मित्र भी। वो आदर्श तो है ही लेकिन वैज्ञानिक भी है। वो ब्रह्मास्त्र को नियंत्रित करना जानते थे जो उस समय के गीने-चुने लोगों को आता था। वह महान योद्धा भी है और कलाकार भी। आज के शब्दों में कहें तो परफेक्शनिस्ट जो कुछ भुक्कड कटवे अभिनेता अपने आपको कहलवाते है।

Sunday, August 15, 2021

अध्यात्म म्हणजे काय!

माझ्या मते अंधविश्वासी होणं, पूजा-पाठ करणं, कुठल्यातरी अजाभक्षक लफंग्याला साईबाबा म्हणून पूजणं म्हणजे अध्यात्मिक होणं नव्हे तर अध्यात्मिक म्हणजे जो/जी/जे आत्मतत्वाला जाणतो/ते(अनुमवतो/ते).
अध्यात्म हा शब्द अधि+आत्म मिळून बनलेला आहे. भारतीय सिद्धांतानुसार प्राणीमात्रात समान आत्मतत्त्व(ब्रम्ह/ह्म) आहे. जेवढं तुमच्या गालावर चापटी मारल्याने दुखतं तेवढंच कुत्र्या-मांजराच्या गालावर मारल्यास दुखतं. जसं तुम्हा-आम्हाला(माणसांना) मरताना दु:ख होतं तसंच 🐜लाही होतं. कुणाही 'जीवाला'  विना संयुक्तिक कारण दुखवणं 'पापंच'!
मला वाटतं हेच खरं अध्यात्म आहे.
अंनिस: एक थोतांड
इंग्रज या देशातून(हिंदुस्थानातून) गेले खरे पण हिंदूंवर अप्रत्यक्षरीत्या 'आपलं शासन' कायम रहावं म्हणून  'मानसिक दासां'च्या स्वरुपात आपली काही चिल्ली-पिल्ली सोडून गेले. यातील काही चिल्ल्यापिल्यांनी अंनिस नावाचं 'भूत' उत्पन्न केलं, जे केवळ सनातन धर्मातील तृटी शोधतात, ज्यांना इस्लाम-ख्रिस्तियता 'ईश्र्वरी' वाटतात, जे कायम तथाकथित 'उच्च'वर्णीय हिंदू विरोधी असतात. कोरोनामुळे आणि नविन संशोधनामुळे खरं तर ते तोंडावर आपटले आहेत पण ते ते मान्य करणार नाहीत. अंनिस हे एक थोतांडच आहे.